कुंडलिनी शक्ति रीढ़ की तीसरी और चौथी हड्डी के जो गोल गोल मोती जैसी हड्डी के बीच में भगवती शक्ति कुण्डलिनी बसी हुई है। शरीर में जो भी सहस्त्रावधी नाडिया वह तीर्थरूप कहलाती हैं। ये तीन नाड़ी है इडा नाड़ी , पिंगला नाड़ी, सुषुम्ना नाड़ी । यह तीर्थरुप हैं जैसे गंगा, जमुना,सरस्वती नदिया, निश्चल निर्मल और पवित्र। जिसमें सुषुम्ना नाड़ी ही मुख्य रूप से महातिर्थ रूप है। सुषुम्ना नाड़ी ही शांभवी शक्ति हैं।सुषुम्ना मार्ग से ब्रह्मस्थान पर पहुंचा जा सकता हैं। सुषुम्ना नाड़ी से कुण्डलिनी हमारे चक्रों को भेदती हुई उपर की ओर चढ़ती है जो कि सहस्त्रार चक्र तक पहुंचती हैं। साधक की साधना सफल होती हैं और वह ब्रह्मलीन हो जाता हैं ब्रह्मलोक के दर्शन होते हैं, आत्मसाक्षात्कार होता हैं साधक का। वहीं यदि कुण्डलिनी सुषुम्ना नाड़ी से नहीं होते हुए ईडा या पिंगला नाड़ी से उपर की ओर मतलब सहास्त्रार तक पहुंचने की कोशिश करती हैं तो साधक अपने जीवन में रास्ता भटक जाता हैं, या तो वह पागल हो जाता हैं, या फिर गलत रास्ते पर चला जाता हैं।कामवासना में भी लिप्त हो सकता हैं या फिर धन अर्जित करने की लालसा में कुछ भी कूमार्ग अपना सकता हैं।
कुण्डलिनी शक्ति क्या है
कुण्डलिनी शक्ति सोई हुई अवस्था में ही होती हैं। ये हमारे कई जन्मों के पाप पुण्य के कारण सोई हुई अवस्था में रहती है। कुण्डलिनी शक्ति साढ़े तीन चक्कर लगाकर बैठी हुई है।इसका मुख त्रिकोणात्मक आकार का है। कुण्डलिनी शक्ति अपने ही मुख से अपनी पूंछ पकड़ कर बैठी हुई है। कुण्डलिनी को सर्पाकार शक्ति कहा गया है क्युकी इसकी गति वलयाकार सर्प जैसी हैं।यह एक विद्युत अग्निमय गुप्त शक्ति हैं । इस शक्ति की गति प्रकाश की गति से भी ज्यादा तेज है।प्रकाश की गति 1लाख 85th प्रति सेकंड की गति से चलता है जबकि कुण्डलिनी 3 लाख 45th मिल प्रति सेकंड की गति से चलती है।ये एक कॉस्मिक एनर्जी हैं।
कुंडलिनी शक्ति जागरण के लक्षण
कुण्डलिनी शक्ति तब ही जागृत हो सकती हैं जब साधक में सच्ची लगन के साथ साधना करने में दिलचस्पी हो। साधक में किसी भी प्रकार का लालच ना होते हुए ध्यान अवस्था में डूब जाने की दिल से चाहत हो,वह पूरी तल्लीनता से साधना करना चाहता हो बदले में कुछ भी पाने की जिज्ञासा के।mind body and soul में purity होनी चाहिए। नित्य वह ध्यान साधना करता हो,मंत्रजाप, ईश्वर की आराधना, सच्चे दिल से मतलब आंतरिक मन से आत्मा से करता हो।केवल बाहरी तौर पर, दिखावा के लिए,दूसरो पर खुद की झूठी शालीनता, भक्ति की नौटंकी करने वाले साधक की कुण्डलिनी जागृत नहीं होती।जिनकी कुण्डलिनी जागृत होती उन्हे किसीको दिखाने की, मुख से खुद की बखान करने की, भक्ति की दूसरो के सामने ढिंढोरा पीटने की आवश्यकता ही नहीं होती। क्युकी कुण्डलिनी जागरण से उसकी शोभा ही अलग होती साधक के रोम रोम से तेजस्विता झलकती है। चेहरे पर एक अलग ही आभा सुशोभित होती हैं, उसको खुद कुछ मुख से कहने की आवश्कता ही नहीं उसका व्यवहार और निर्मल निश्चल आचरण ही सब कुछ बयां कर देता हैं। वह बदले किसी से बिना कुछ भी अपेक्षा के सबकी मदद करने के लिए तत्पर रहता हैं।लोग उसकी बुराई करे या भलाई इससे उसे कुछ भी फर्क नहीं पड़ता,कोई उससे दुश्मनी भी रखता हो, तो भी उसके मन्न में व्यवहार में कोई दुश्मनी नहीं झलकती। उससे दुश्मनी रखनेवालों से भी यदि जरूरत पड़ने पर तत्शन तैयार रहता है।
कुण्डलिनी शक्ति के पॉवर
कुण्डलिनी शक्ति जिनकी भी जागृत होती हैं, उन्हे कुदरत से अनेकों पॉवर मिल जाते है, पर ईश्वर किसे भी यू ही किसीको भी पॉवर नहीं देते, योग्य लोगों को ही अलौकिक शक्तियों और पॉवर मिलते हैं। सुषुम्ना नाड़ी जब सभी चक्रों को भेदती हुई जब sahastrar सहस्ट्रार तक पहुंचती हैं तो वह सभी चक्रों को खोलती हुई आगे बढ़ती है।इन चक्रों में हमारे कई जन्म के कर्म छुपे हुए होते है,तो जैसे जैसे कुण्डलिनी शक्ति उपर चढ़ती है, वैसे वैसे कई जन्मों के अच्छे बुरे कर्म सामने हमारे जीवन को प्रभावित करना शुरू कर देते है।हर साधक के भिन्न भिन्न अनुभव हो सकते है।किसी के रिश्ते टूट जाते है तो किसी के कोई अन्य रिश्ते जुड़ भी जाते है। कोई अचानक से धनवान बन जाता हैं तो किसी का बसा बसाया उद्योग चौपट भी हो सकता हैं। सब हमारे पीछले और ये जन्म के कर्मो के अनुसार फल मिलन शुरु हो सकता हैं। कुण्डलिनी शक्ति उपर चढ़ने के लिए मार्ग बनाते हुए सभी कर्मो को भी balance करती हुई चलती हैं।साधक कई बार ऐसी अवस्था में भटकाव की स्थिति में आ जाते और रास्ता भटक जाए क्युकी उनके कर्मो के कारण कुंडलिनी के रास्ते में रुकावट आती और वह इड नाड़ी या पिंगला नाडी से निकलने के मार्ग ढूंढ़ती हैं।यही स्थिति साधक को भटका देती हैं।ये इतना आसान नहीं तो मुश्किल भी नहीं।पर अध्यात्मिक मार्ग पर चलने के लिए साधक को संयम रखना जरूरी है साथ ही सहनशीलता भी।साधक यही पर घबरा जाते वीडियो वगैरह पर दिखाई जाने वाली बाते पूर्ण सत्य भी नहीं होती। ये आपका मारगदर्शन नहीं करेंगे या तो किस्मत से आजकल के माहौल में आपको सच्चे गुरु मिले तो ठीक अन्यथा स्वयं गुरु होना ही सर्वश्रेष्ठ है खैर,यदि नित्य ध्यान साधना की जाए तो कुंडलिनी ही आपका मार्गदर्शन करेंगी।यह शक्ति चाहे सहस्त्रा तक ना पहुंची हो पर यदि जागृत भी हो गई हो तो भी आप के मन में कोई लालच या कुकर्म के कुछ कुविचार नहीं आए तो कुण्डलिनी ही आपका मार्गदर्शन करेंगी।
कुण्डलिनी शक्ति जागरण के लक्षण
ब्रह्मांड में जितनी भी शक्तियां हैं जितनी भी सकारात्मकता, सकारात्मक शक्तियां है वह सब की सब ईश्वर ने इस पिंड रूपी शरीर में स्थापित कर दिया है। पर कर्मो के कारण ये सारी शक्तियां सुप्त अवस्था में स्थापित हो गई है। पर असीम साधना से इसे सुप्त से जागृत अवस्था में पहुंचा जा सकता हैं। जैसे कोई बंद दरवाजा चाबी लगाने से खुल जाता हैं।मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त होना शुरु हो सकता हैं।यह बहुत ही सीधा और सरल मार्ग है यदि सच्ची लगन और मेहनत से किया जाए तो।लक्षण बताती हूं
- साधना करते वक़्त यदि शरीर के किसी भाग में गर्मी,heat लगती हो, बाकी पूरा शरीर का नॉर्मल टेंपरेचर हो तो इसका मतलब आपके शरीर के उस भाग से नकारात्मक ऊर्जा बाहर निकल रही हैं।
- कभी कभी लगता है की शरीर का कोई हिस्सा साधना करते वक़्त के समान कड़क हो रहा हो तो इसका मतलब है कि ब्लॉकेज क्लियर हो रहा है।
- कभी शरीर का कोई हिस्सा साधना करते वक़्त फड़कने लगता है, ऐसी अवस्था में जो सकारात्मक ऊर्जा सैटल होने की कोशिश कर रही है।
- कभी चींटियां घूम रही या काट रही ऐसा प्रतीत होता मानो चींटियों की पंक्ति पूरे बदनमे दौड़ रही है इसका मतलब जो ऊर्जा साधना करते वक़्त उत्पन्न हुई वह शरीर में अपनी जगह स्थापित करने की कोशिश कर रही है।
- कभी कभी हाथ या पैर सुन्न हो गए sensation नहीं है ऐसा लगता क्युकी हमारी औरा बॉडी और physical body की एनर्जी एक दूसरे के साथ मैच होने की कोशश कर रही होती।
- शरीर से बाहर निकले ऐसा लगने ,एक हल्का पं लगन ये सब का मतलब यही है की आप अध्यात्मिक रास्ते पर उन्नति कर रहे हो।
अध्यात्मिक रास्ते पर चलने से आत्मा शरीर मन सबकुछ पवित्र होना शुरु हो जाता हैं।
मेरा ब्लॉग पढ़ने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया, अच्छा लगे तो लाइक, शेयर और फॉलो जरूर करे, इस तरह के ब्लोग्स और विडियोज अपलोड करती रहूंगी यदि आप लोगो ने मेरा साथ दिया तो, धन्यवाद्।
